कर्मो की गति (मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?)Law of Karma



कर्मो की गति (मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?)



हम सभी के जीवन में कभी कभी ऐसी घटनाएँ घटित होती है, जब हम बहुत दुःखी और हताश महसूस करते हैं और अपनी इस परिस्थिति के लिए ईश्वर पर ऊँगली उठाने में लग जाते है। क्या यह सत्य नहीं है ?क्या वास्तव में ईश्वर ही हमारे दुःख का कारण है ?आखिर भगवान् अच्छे लोगो के साथ बुरा और बुरे लोगो के साथ अच्छा क्यू करता है ?यह सवाल हम सभी के मन में कभी कभी आता ही है। उम्मीद है, कि आज आपको इन सवालो के जवाब मिल जाएंगे।


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कर्मो का नियम 


आप सभी ने "कर्मो की गति "(law of karma) के बारे में सुना ही होगा। हमारे जीवन में जो सुख या दुःख आते है इसका मुख्य कारण हमारे कर्म हैं।"भागवत गीता" में भी 'कर्म का सिद्धांत' वर्णित हैं।हर मुनष्य कर्मो के सिद्धांत को अच्छे से जानता है पर फिर भी दुःख आने पर भगवान् को कोसने लग जाते है  "हमारे साथ ही ऐसा क्यू किया ?"और इसके पूरक जब जीवन में सुख मिलता है तो भगवान् की याद भी नहीं रहती।यह कहावत तो सुनी ही होगी , "दुःख में सिमरन सब करे ,सुख में करे कोई "आपको ऐसा लगता है की भगवान् ने इतने लाखो ,करोङो लोगो का हिसाब किताब लगा के रखा है कि कब किसको सुख देना है और कब दुःख।ईश्वर जिसको हम सभी मानते है ,पूजते है वो इतना निर्दयी कैसे हो सकता है।संसार में ऐसे कितने लोग है ,जिनके पास तो रहने को घर है और दो वक़्त की रोटी।उनमे भी ऐसे कितने है जो अपाहिज होते जिन्हे देखकर दया भी आती है और मन में वही सवाल उठता है भगवान् ने इनको ऐसा क्यू बनाया।तो क्या भगवान् की इन लोगो से कोई दुश्मनी है जो  इनको ऐसा बनाया?सबसे पहले तो यह समझना होगा कि हम सब एक ईश्वर की संतान है ,तो एक पिता(ईश्वर ) अपने बच्चो में भेदभाव कैसे कर सकता है।


  • मनुष्य योनि में जन्म लेने वालो को कर्मो का फल भुगतना पड़ता ही है।इससे मुक्ति कभी नहीं मिलती है। अच्छे कर्मो का फल अच्छा और बुरे कर्मो का फल बुरा मिलता ही है।  कुछ कर्मों का फल इसी जीवन में  मिल जाता है और कुछ कर्मों का फल आने वाले जन्मों में मिलता है|


  • हमारे अध्यात्म में कर्मफल का बखूबी वर्णन है।जैसा बीज बोयेंगे वैसे फल पाएंगेहम जो भी कर्म करते है ,वह हमारा आज और कल निर्धारित करते हैं।कर्म भौतिक ,सामाजिक,आध्यात्मिक कोई भी हो सकता है। पर एक बात निश्चित है कर्म का फल तो भोगना ही हैं।

  • जब मनुष्य के जीवन में सुख होता है तब ईश्वर को शुक्रिया करने का भी वक़्त नहीं होता ,और जरा सा दुःख आने पर भगवान् से शिकायते शुरू कर देते। शायद इंसान की फितरत ही ऐसी होती है ,दूसरे को दोषार्पण करना ज्यादा आसान है बजाये इसके की हम पहले अपने कर्मो को देखे।


  • जब इंसान भोग लिप्सा के लिए चोरी चकारी ,जीवो की हत्या ,झूठ,बलात्कार आदि जैसे कुकर्म करता तब तो नहीं सोचता कि इस कर्म का फल क्या होगा। तो फिर परिणाम मिलने पर भगवान् को दोषी  क्यों ठहरा देते? कुकर्म करते वक़्त भगवान् से पुछा था क्या ?अगर हम एक क्षण भी भगवान् को याद करके कर्म करे तो कोई काम गलत होगा ही नहीं और जीवन में दुःख भोगने पड़ेंगे


  • जैसे हमने देखा है कि एक ही घर में जन्म लिए बच्चो का भाग्य भी अलग होता है यह सब उनके पूर्व जन्मो के कर्मो पर आधारित होता है। माँ चाहकर भी अपने बच्चो  के भाग्य को बदल नहीं सकती। इसीलिए हम कर्म और भाग्य को अलग नहीं कह सकते , क्योंकि दोनों एक दूसरे के पूरक है।हमे कोशिश करनी चाहिए कि हमसे कोई भी कर्म ऐसा जिससे किसी को  हानि पहुंचे चाहे वह शारीरिक हो ,मानसिक हो या ,आध्यात्मिक हो।


  • मुनष्य का आचरण उसकी संगति पर आधारित है। हम अच्छे व्यक्ति के साथ रहे तो निश्चित ही अच्छा प्रभाव पड़ेगा और कर्म भी अच्छा होगा किंतु वहीं शराबी,कबाबी,व्यभचारी व्यक्तियों का साथ बुरा प्रभाव डालता है और हमारे कर्म भी बुरे होने लगते।


  • हिन्दू ग्रंथो के हिसाब से, जब भगवान् कर्मो के फल से नहीं बच पाए तो साधारण मनुष्य क्या चीज़  है फिर।  श्री भगवत गीता में श्री कृष्ण के द्वारा कर्म प्रधानता और फल प्राप्ति की बात की गई है अथवा रामायण में राजा दशरथ के पुत्र श्री राम ने भी अपने कर्मों के फल को भोगा है। श्री कृष्ण की मृत्यु बहेलिए के तीर से कर्म फल के आधार पर हुई थी अथवा श्री राम का वियोग दशरथ जी के द्वारा किये गए श्रवण कुमार की भूलवश हत्या का परिणाम और श्रवण कुमार के माता पिता का पुत्र वियोग में मृत्यु के फलस्वरूप राजा दशरथ को भी अपने प्राण पुत्र वियोग में ही गंवाने पड़े थे।


कर्म शून्य कैसे हो?


  • मनुष्य को अपने कर्मो के फल जरूर भोगने पड़ते हैं |अब प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य बिना कर्म किये कैसे जी सकता है? और वह कर्म-शून्य कैसे हो सकता है ? जब तक मनुष्य में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, राग, द्वेष आदि विकार रहेंगे तब तक कोई कोई कर्म गलत होता रहेगा। जब ये विकार ख़त्म होते जाएंगे तो वह किसी भी तरह से कष्ट नहीं दे सकता और वह कर्म फलों से शून्य हो जाता है, सुख और दुःख को छोड़कर ईश्वर को प्राप्त कर लेता है|इसके लिए दृढ़ संकल्प और कठिन अनुशासन की आवश्यकता है| लेकिन यही मुक्ति का मार्ग भी है| दरअसल दुनिया के सारे धर्म अपने अपने तरीक़ों से यही तो सिखाना चाहते हैं कि किसी भी जीव को कष्ट दो।


  • मनुष्य का धर्म चाहे जो भी हो ,तो सच्चे मन से ढूंढने पर अपने ग्रंथों में ईश्वर के वचन मिल ही जायेंगे ,जिससे उसकी धारणा करने पर उसके विकार नष्ट होंगे|

  • तो हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम श्रेष्ठ कर्म करें ,ईमानदारी से अपना जीवन जिए तो निश्चित ही अच्छे फल की प्राप्ति होगी।



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धन्यवाद
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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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