स्वयं की खोज -"मैं कौन हूं"? svayam ki khoj - mai kon hu?



स्वयं की खोज -"मैं कौन हूं"?

Svayam ki khoj - "mai kon hu"?

"मै कौन हूँ "?यह सवाल आजतक पहेली बना हुआ है। सभी लोगो के मन में कभी कभी यह सवाल जरूर आता है पर अपनी जिंदगी में सब इतने व्यस्त हैं कि इस तरफ विचार ही नहीं जाता कि वास्तव में  "मैं कौन हूँ "?महावीर , बुद्ध आदि जैसे महापुरुष ही इस सवाल को जान पाए हैं।जीवन से मृत्यु तक का सफर तय कर लेते हैं पर यह सवाल अधूरा ही रह जाता है। क्या वास्तव में ऐसा नहीं है ?

मै कौन हूँ ?

स्वयं की खोज -"मैं कौन हूं"? svayam ki khoj - mai kon hu?
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  • आज के दौर में हर व्यक्ति इधर उधर भाग रहा है, इंसान शायद खुद को खोज रहा है, क्योंकि उसने खुद को इस दुनिया की भीड़ में कहीं खो दिया है। स्वयं के साथ सम्बन्ध तोड़, दूसरों से सम्बन्ध जोड़ने की कोशिश में लगा रहता है। यदि आप अपने आसपास देखंगे तो हर आदमी में यही बात नजर आएगी। एक व्यक्ति स्वयं को भूलकर बेकार की भागदौड़ में चला जा रहा है। वह खुद को भूल गया है कि आखिर वह कौन है? आज हमें आवश्यकता है इस झंझट से निकलने की, स्वयं के अस्तित्व को जानने की। स्वयं के अस्तित्व को जानकर ही हम जीवन के सही मूल्यों को जान लेंगे। क्या आपके मन में कभी ये विचार नहीं आया कि "मैं कौन हूँ"? कहाँ  से आया हूँ ?और क्यों आया ?इन सवालो के जवाब तभी मिल सकते हैं जब खुद को जानने की इच्छा हो। यह सारे जवाब आपके भीतर ही है किसी के पास समय ही नहीं खुद के साथ दो पल बिताने के लिए। क्या ऐसा नहीं है ?



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  • स्वयं की खोज द्वारा हमें अपनी अंतरात्मा को जानना चाहिए। हमारा ध्यान बाहरी दुनिया में फंसा हुआ है, इसलिए हम अपने अंदर छिपी विराटता को भूल जाते हैं। हम बहिर्मुखी हैं, अंतर्मुखी नहीं। बस, यही हमको समझना है। सारी परेशानी ही खुद को समझने में है। हम अपने परमपिता परमेश्वर के प्रति भी कृतज्ञता नहीं करते, जिसने अपनी परम कृपा से हमें अपना ही अंश बनाकर इस धरती पर मनुष्य रूप में भेजा है। याद रहे कि इस जगत में स्वयं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं पाया जा सकता है। जो उसे खोजते हैं, वे पा लेते हैं।
  • जो लोग भौतिक जीवन की तरफ भागते रहते हैं वह नष्ट हुए हैं- नष्ट होते हैं- और नष्ट होंगे।यही हमारे आत्म-विनाश का कारण है।“जिंदगी चलते रहने का नाम नही, बल्कि कुछ अच्छा कर गुजरने का नाम है”।जब तक स्वयं को नहीं खोजोगे तब तक दूसरों को भी समझना मुश्किल है। स्वयं को बिना जाने किसी और को कैसे खोजा जा सकता है?
  • इन सब की वजह है कि हम ने खुद को एक दायरे में सिमित कर रखा  है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक खुद को जिम्मेदारियों में कैद कर लिया है और इन सब में खुद से दूर होते चले गये है। मेरा मतलब यह नहीं की जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करा जाए। इस समाज में रहते हुए ,अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए क्या थोड़ा वक़्त खुद से मुलाकात करने में नहीं निकाल सकते ?
  • स्वयं को खोजने के लिए कि "मै कौन हूँ"? उसके लिए कही बाहर जाने की या घर को छोड़कर या सन्यास लेना जरुरी नहीं ।स्वयं को पहचानने के लिए केवल एक कोशिश ही काफी है। अगर आपने "मैं कौन हूँ" यह जानने के लिए एक कदम बढ़ाया है तो समझिये आधा रास्ता तो तय कर लिया, क्यूकि हरअच्छे काम को सफल बनाने के लिए विघ्नो को तो झेलना ही है। मै कौन हूँ का जवाब जानने का एक ही रास्ता है "ध्यान"! काम, गुस्सा, ईर्ष्या, लोभ, मोह, द्वेष, और अहंकार जैसे विकारो ने हमे घेर रखा है, तो इससे मुक्त का एक ही रास्ता ध्यान है। ध्यान के माध्यम से ही हम स्वयं को गहराई से जान सकते हैं। स्वयं को समझ लिया तो दूसरों को समझना आसान हो जाएगा। 

मैं कौन हूँ क्यों जरुरी है जानना?

  • हम अपने आप को सिर्फ शरीर के लेवल तक ही समझ पाते हैं ,पर इससे ऊपर भी कुछ और है जिसे हम ऊर्जा या आत्मा कहते हैं। शरीर और आत्मा दोनों अलग है।इन दोनों के मिलने से जीवात्मा बनती  है। जीवित आत्मा का अर्थ है शरीर के साथ काम करने वाली चैतन्य शक्ति। यह आत्मा और शरीर एक दूसरे के बिना अधूरे है पृथ्वी ,जल ,वायु ,अग्नि और आकाश - ये  पांच जड़ तत्व हैं  जिनसे यह शरीर बना है। जब पांच तत्वों से बने शरीर से आत्मा निकल जाती है तो भी शरीर के अंदर पांच  तत्व रहते है,उन्ही को जलाया या मिट्टी में दबाया जाता है।
  • वे तो जड़ तत्व हैं लेकिन फिर आत्मा क्या
  • चीज है ? आत्मा  के भी  तीन रूप है (मन ,बुद्धि और संस्कार )वह बहुत सूक्ष्म  ज्योतिर्बिंदु है।
  • मन -बुद्धि की शक्ति का दूसरा नाम ही आत्मा है। ऐसा कहा जाता है कि जन्म के समय भी खाली हाथ आते है और मृत्यु  के समय भी कुछ साथ नहीं जातां।जन्म और मृत्यु दोनों के समय हमारे कर्म (संस्कार ) चलते है।  मन -बुद्धि में ही इस जन्म के और पूर्व जन्मो के संस्कार भरे रहते हैं।जैसे एक बच्चा अमीर घर में पैदा होता है और एक गरीबी में। तो यह सब कौन तय करता है,ईश्वर तो ऐसा नहीं करेगा। उसके सब बच्चे एक समान है।सब अपने कर्मो के आधार पर जन्म लेते है। इस प्रकति या परमात्मा ने सब कुछ कितना सुन्दर और एक्यूरेट बनाया है। जन्म के साथ जो कुछ भी हमे मिलता है (शरीर,नाम,परिवार)इसी को हम जीवन का सत्य समझ लेते हैं।



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  • पर यह सोचिये जब यह शरीर ही आपका नहीं है तो बाकि सब को कैसे अपना समझ लिया ? इस जीवन मे जो कुछ भी मिला है सब अल्पकाल के लिए है।सारा जीवन मेरा मेरा करने में निकाल देते हैं और अपनी वास्तविकता को भूल जाते। आपकी आत्मा ही है जो कभी नहीं मरती। जब तक आत्मा है यह शरीर भी है। आत्मा अजर,अमर ,अविनाशी है और शरीर विनाशी।
  • आज संसार में कितनी  दुःख तकलीफ हैं ,कोई इंसान ऐसा नहीं मिलेगा जो परेशान हो। क्या कभी आपने सोचा है कि इसके पीछे वजह क्या है ? हर इंसान अपने देहभान में ही उलझा  हुआ है।हर बात में मेरापन का भाव जुड़ा है और यह मेरापन का भाव ही हर  दुःख का कारण है। हम सब जानते हैं कि सभी धर्मो का सार एक ही  है।
  • अपने आप  को जानने की वजह से ही आज रिश्ते भी बहुत नाजुक हो गए हैं। सारा जीवन एक दूसरे को समझने में निकाल  देते हैं फिर भी अंत तक समझ नहीं पाते। जो इंसान कभी खुद को नहीं समझ पाया वो दूसरे को कैसे समझ सकता है और इन्ही शिकायतों में रिश्ते टूट जाते हैं। इस दुनिया में हर व्यक्ति बहुत स्पेशल है जो जैसा है उसको वैसे स्वीकार करे तो रिश्ते कितने सुन्दर बन जाए , पर हम तो सारी जिंदगी दुसरो को अपने अनुसार बनाने की कोशिश में लगे रहते और यही सबसे बड़ा दुःख का कारण बन जाता। आपके जीवन में  सुख ,शांति,प्यार  तभी पाएगा  जिस दिन खुद को जान लेंगे और अपने आप को जानने का एक ही रास्ता है वो है "ध्यान"(meditation).

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ध्यान क्या है?

  • ध्यान कोई क्रिया नहीं है, कोई आसन नहीं है। ध्यान का अर्थ है - जो भी कर्म करते हैं एक ध्यान में हो करना। जैसे -अपनी दिनचर्या में ऐसे कितने कर्म करते हैं, ध्यान से खाया हुआ भोजन भी ध्यान है, एकाग्र होकर पड़ना भी ध्यान है, ध्यान से जो हुआ वानी भी ध्यान है ।
  •  लेकिन हम ध्यान को आंख बंध कर कर, पलंती मारकर एक चेतना से बैठने को ही ध्यान कहते है। एक चित्त में रहकर किआ गया काम ही ध्यान होता है। तो ध्यान करें और स्वयं को खोजे। जैसे ही स्वयं को खोज लोगे तो आप पाओगे कि आप एक अलौकिक दुनिया में हो और खुद को बहुत हल्का महसूस करेंगे और सारे विकार एक एक कर के समाप्त हो जाएंगे।



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धन्यवाद।






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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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