परमात्मा की खोज.Parmatma ki khoj (Who is God?)


 परमात्मा की खोज (Parmatma ki khoj)

(Who is GOD?)


परमात्मा की खोज सदियों से जारी है पर अभी तक कुछ महान महापुरुष ही ईश्वर को खोज पाए है। इस संसार में समस्त प्राणी ईश्वर को पाने के  लिए दर दर भटक रहे है पर उसको जान नहीं पाए। सभी धर्मो ने ईश्वर की अलग अलग परिभाषा दी है।सभी धर्मो का सार तो एक ही था "ईश्वर एक है" यह सोचने वाली बात है कि ईश्वर ने इतने सारे धर्मो की स्थापना की या अलग धर्मो के लोगो ने ही ईश्वर को अलग अलग रूप में बाँट दिया।क्या वास्तव में ईश्वर के इतने सारे रूप हैं ?सच क्या है ?कौन है परमात्मा ?



परमात्मा की खोज.Parmatma ki khoj
parmatma ki khoj



परमात्मा का रूप कैसा है ?

   
ईश्वर कोई स्री ,पुरुष ,पेड़ या  प्रकति नहीं है। हम लोग ईश्वर को कोई कोई रूप मानकर पूजते रहे है। वास्तव में तो ईश्वर का कोई रूप,रंग ,आकार है ही नही। ईश्वर है "निराकार "।हम साधारण मनुष्य ईश्वर को इन आँखों द्वारा देख सकते है कानो द्वारा सुन सकते। ईश्वर को हम सिर्फ महसूस कर सकते है अपने भीतर।


कैसे खोजें ईश्वर को ?


अलग अलग मतों के अनुसार हम ईश्वर को किसी किसी रूप में पूजते रहे है उसका कारन यह है कि मनुष्य के शरीर में पांच इन्द्रियाँ एक लिमिट तक ही चीज़ो को देख या सुन पाती है। इन आँखों द्वारा जो दिखता है उसको ही सत्य समझ लेते है।अगर ईश्वर का कोई रूप बनाया होता तो मनुष्य के लिए पूजना मुश्किल काम हो जाता। जब हम किसी रूप की पूजा करते है तो  एक भाव मन से जुड़ जाता है जिससे मुनष्य खुद को ईश्वर से जोड़ पाने में समर्थ महसूस करता है। यह तो सिर्फ एक साधन है खुद को ईश्वर के प्रति जोड़े रखना का।

अगर आप सही मायने में ईश्वर को खोज रहे है तो अपने अंदर "मैं "को ख़त्म करना होगा। हर मुनष्य अपने को देह के रूप मे ही देखता है और ईश्वर को भी देहधारी मान लिया है।शरीर आपका है पर कभी सोचा है इस शरीर को कौन चला रहा है ?प्राण छूटने पर शरीर वैसे काम क्यू नहीं करता जैसे जिन्दा होने पर ? जिस दिन आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाएगा सारे जवाब मिल जाएंगे।


परमात्मा की खोज.Parmatma ki khoj
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सभी धर्मो का एक ही कहना था सब लोग प्रेम ,शांति,अहिंसा ,बिना भेदभाव के रहे। पर आज तो इन शब्दों का कुछ अर्थ ही नहीं रह गया। सभी धर्मो के लोग एक दूसरे को नीचा दिखने में लगे हुए हैं।लोगो की इंसानियत तक ख़त्म हो  गयी है और दावे करते है ईश्वर प्राप्ति की।प्राचीन काल से मनुष्य कर्म काण्ड ,हवन, यज्ञ ,दान पुण्य ,तीर्थ यात्रा आदि करते आए है ,इन सब बातो का एक विशेष महत्त्व था कि मनुष्य के अंदर सकारत्मक ऊर्जा रहे  और अपने मन की शुद्धि हो सके। ईश्वर प्राप्ति के लिए मन का शुद्ध होना बहुत जरुरी है। पर आज जो युग चल रहा है इसमें तो सारे कर्म काण्ड का मतलब ही बदल गया।यह सिर्फ एक माध्यम है अपने विचार को शुध्द करने का। आजकल सिर्फ एक औपचारिकता (formality )बन गयी है ,दिखावे के लिए लोग ज्यादा से ज्यादा खर्चा करते है,भगवान से भी पैसो का व्यापार करने लग गए हैं कि मेरी ये इच्छा पूरी  हो जाए तो इतना भेंट चढ़ाएंगे। क्या ईश्वर को आपने लालची समझ लिया है ?जो  भी हमारे वेद ,शास्त्र में लिखा है सबने उसको अपने अपने अनुसार समझ लिया है और ईश्वर को खुश करने की नयी नयी योजनाए निकाल ली है।  अगर आप ऐसा सोचते हैं  तो  भ्रम हैं ,जितनी जल्दी इससे बाहर निकलेंगे परमात्मा को खोजना आसान होगा।  अगर ऐसा करने  से ईश्वर की प्राप्ति हो जाती तो संसार में कोई दुःख तकलीफ ही होती।लेकिन आज क्या हाल हो गया है संसार का चारो तरफ भटक रहे है ,हर जगह ढूँढ रहे पर कितने लोग सफल हुए ईश्वर तक पहुंचने में?
  


दान पुण्य ,कर्म काण्ड का महत्व


आप पूजा पाठ,दान पुण्य ,व्रत या भेंट जो भी करना चाहते है जरूर करें लेकिन अपने भाव शुद्धि ,पवित्रता के साथ और बदले में कोई शर्त रखें।ऐसे कर्म काण्ड का कोई  महत्व नहीं जब मन  में दुसरो के प्रति  द्वेष ,घृणा ,क्रोध हो।

ईश्वर तक पहुंचने के  लिए अपना आत्मदर्शन करना जरुरी है।ईश्वर ने तो सबके लिए दरवाजे खोल रखे है चाहे अमीर हो या गरीब। इंसान के विचार ही उसको महान बनाते हैं। अब जरुरत है तो उस दरवाजे तक पहुंचने की।



कैसे परमात्मा तक पहुंचे ?


परमात्मा तक पहुंचने का आजतक एक ही माध्यम रहा है वो है "ध्यान"ध्यान करना तभी आसान होगा जब आप अपने आप को जान लेंगे। अब सवाल यह है की ध्यान किसका करना है ?

ध्यान का मतलब किसी को याद करना नहीं है इसका मतलब है जो कुछ भी हमारे मन में है उसको छोड़ देना है और एक ऐसी अवस्था बनानी है जब चेतना (consciousness) रह जाए। जैसे हम एक मोमबत्ती जलाए और सारी चीजे हटा दे तो भी मोमबत्ती रौशनी करेगी। वैसे ही अगर हम मन से सरे objects ,सारे विचार ,सारी कल्पनाएँ हटा दे ,तो क्या होगा ? चेतना अकेली रह जाएगी और वह अवस्था ही ध्यान है।



परमात्मा की खोज.Parmatma ki khoj
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क्या धारणा और ध्यान एक ही है ?


नहीं ,धारणा किसी की होती है और ध्यान किसी का नहीं होता। ध्यान के लिए हम बहुत सारी धारणाएँ करते है जैसे श्वासः पर ,चक्रो पर ,अपनी भृकुटी के बीच में फोकस करते है तो यह सब धारणाएँ हुईं। इस धारण के माध्यम से एक अवस्था ऐसी आती है की सारे विचार विलीन हो जाएंगे ,शरीर का भी भान नहीं रहेगा।यही अवस्था ध्यान है।

अब आप कह सकते है कि धारणा ही करनी है तो ईश्वर की धारणा करें ?या किसी मूर्ति की धारणा करें ?

ऐसा करना खतरनाक हो सकता है ,वह इसलिए जब आप मूर्ति का धारणा करेंगे तो वह मूर्ति ही आपको दिखाई देती रहेगी।कोई कृष्णा की धारणा करते, कोई किसी और की। तो आपको ध्यान में वही मूर्ति सजीव दिखने लग जाएगी , और उसी को आप परमात्मा का दर्शन समझ लेंगे। यह सब मात्र आपकी कल्पना है। सही मायने में परमात्मा के साक्षात् का तो कोई रूप है कोई चेहरा और ही कोई आकार है। जब चेतना शून्य (निराकार) में पहुंच जाती है उस क्षण ही परमात्मा को प्राप्त कर लेती है। परमात्मा का दर्शन नहीं होता ,परमात्मा मिलन का एहसास होता है।

मेरी आशा है कि आप को परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग मिल गया होगा ?



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धन्यवाद 

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Milan Tomic

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